Premchand ki Ladkiyan: राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) के ‘कलरव’ फेस्टिवल (Kalrav Festival) में मंचित नाटक ‘प्रेमचंद की लड़कियां’ ने दर्शकों को भावुक कर दिया। 15–16 जनवरी 2026 को अभिमंच सभागार में हुए इस मंचन में युवा कलाकारों ने प्रेमचंद की कहानियों को नए जीवन के साथ पेश किया।
जब अभिमंच सभागार की बत्तियां बुझीं और मंच पर रोशनी आई, तो वहां सिर्फ नाटक नहीं चल रहा था—वहां समय का पहिया घूम रहा था। मुंशी प्रेमचंद की कहानियां महज स्याही से लिखे शब्द नहीं हैं, बल्कि वे हमारे समाज की रूह पर लगे वो घाव हैं जो आज तक नहीं भरे। यह प्रस्तुति Hindi theatre के लिए एक खास Theatre Festival अनुभव बनकर सामने आई।
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) की प्रतिष्ठित संस्कार रंग टोली (TIE Company) द्वारा आयोजित ‘कलरव’ (Kalrav Festival) संडे क्लब थिएटर फेस्टिवल (Part-III) के तहत 15 और 16 जनवरी 2026 की शाम, एनएसडी, दिल्ली के अभिमंच सभागार में मुंशी प्रेमचंद की कालजयी रचनाओं का एक अद्भुत संगम देखने को मिला। नाटक ‘प्रेमचंद की लड़कियां’ महज चार कहानियों—‘बड़े घर की बेटी’, ‘कफन’, ‘दूध का दाम’ और ‘कायर’—का मंचन नहीं था; यह उस ‘मूक वेदना’ और ‘पितृसत्ता की बेड़ियों’ का दस्तावेज था, जिसे महिलाएं सदियों से चुपचाप सहती आ रही हैं।
लेकिन इस शाम को जो बात सबसे खास और भावुक बनाती है, वह थी—Hindi theatre मंच पर मौजूद कलाकार। 15 से 19 साल के वो नाजुक कंधे, जिन्होंने प्रेमचंद के भारी-भरकम और जटिल किरदारों का बोझ इतनी सहजता से उठाया कि देखने वाले दंग रह गए। क्या एक टीनेजर (Teenager) 60 साल के बूढ़े की लाचारी या एक शोषित स्त्री का दर्द समझ सकता है? इस सवाल का जवाब इन नन्हें कलाकारों ने अपनी खामोश निगाहों और दमदार संवादों से दिया। उन्होंने साबित कर दिया कि अभिनय उम्र का नहीं, संवेदना का खेल है।
इन कहानियों में 1930 का भारत दिखता है, लेकिन सवाल आज के समाज से भी उतने ही जुड़े हैं।
Premchand ki Ladkiyan: चार कहानियों का महा-संगम और अमित के. कुशवाहा का ‘संवादात्मक’ विजन
यह नाटक मुंशी प्रेमचंद की चार कालजयी कहानियों—‘बड़े घर की बेटी‘, ‘कफन‘, ‘दूध का दाम‘ और ‘कायर‘—को एक ही सूत्र में पिरोने का एक साहसिक और जटिल प्रयास है।
रूपांतरण (Adaptation) की चुनौती और सफलता: नाटक के रूपांतरण और सह-निर्देशन की जिम्मेदारी अमित के. कुशवाहा ने संभाली है। एक लेखक और एडाप्टर के तौर पर उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी—प्रेमचंद की मूल आत्मा, सामाजिक संदर्भ और वैचारिक पक्ष (Ideological Essence) से छेड़छाड़ किए बिना उन्हें एक मंच पर लाना। अमित ने इन स्वतंत्र कहानियों को जोड़ने के लिए किसी बाहरी सूत्रधार का सहारा नहीं लिया, बल्कि उन्होंने एक “इमोशनल थ्रेड” (भावनात्मक धागे) की खोज की। उन्होंने स्त्री पीड़ा, गरीबी और नैतिक संघर्ष के समान तत्वों को पकड़कर कहानियों को आपस में गूंथ दिया।
‘डायलॉजिक रेजोनेंस‘ (Dialogic Resonance) का निर्माण: अमित के. कुशवाहा के काम की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि उन्होंने मंच पर “संवादात्मक प्रतिध्वनि” (Dialogic Resonance) पैदा की। इसका मतलब है कि एक कहानी का पात्र दूसरी कहानी के पात्र से संवाद करता है, लेकिन वह अपने मूल चरित्र और स्वभाव (जो प्रेमचंद ने लिखा था) से जरा भी नहीं भटकता।
उन्होंने ‘रचनात्मक हस्तक्षेप’ (Creative Intervention) और ‘मूल पाठ के प्रति वफादारी’ (Fidelity to Original Text) के बीच एक अद्भुत संतुलन बनाया है। यही वजह है कि अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमि के पात्र मंच पर एक ही दुनिया के बाशिंदे लगते हैं, जो पितृसत्ता और सामाजिक असमानता के खिलाफ एक साझा लड़ाई लड़ रहे हैं ।
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अभिनय का चरम: चैतन्य का ‘घीसू‘ अवतार—जिसे देखकर हॉल में सन्नाटा पसर गया

इस नाटक में 15-19 वर्ष के कई प्रतिभाशाली कलाकार थे, लेकिन जिस एक चेहरे ने दर्शकों की रूह को झकझोर कर रख दिया, वह थे—चैतन्य। उन्होंने मुंशी प्रेमचंद की सबसे कठिन कहानी ‘कफन’ के अमर पात्र ‘घीसू‘ को मंच पर पुनर्जीवित कर दिया ।
एक अविश्वसनीय रूपांतरण (Transformation): यह केवल अभिनय नहीं, बल्कि कायापलट था। एक 15-16 साल के किशोर का 60 साल के बूढ़े, कामचोर और हालात के मारे ‘घीसू’ में बदल जाना किसी जादू से कम नहीं था। चैतन्य की झुकी हुई कमर, कांपती आवाज और आँखों में ‘आलू भूनकर खाने’ की वो आदिम भूख—सब कुछ इतना वास्तविक था कि दर्शक भूल गए कि वे कोई नाटक देख रहे हैं।
सजीव चित्रण: चैतन्य ने ‘घीसू’ के किरदार के साथ सही मायनों में न्याय (Justice) किया है। उन्होंने इस पात्र को महज कहानी के पन्नों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि दर्शकों के सामने एक जीते-जागते सजीव इंसान के रूप में खड़ा कर दिया। जब उन्होंने घीसू की “भूख की फिलॉसफी” और निष्ठुरता को मंच पर उतारा, तो पूरे ऑडिटोरियम में सुई गिरने जैसी खामोशी (Pin-drop silence) छा गई। आलोचकों और थिएटर प्रेमियों का मानना है कि इतनी कम उम्र में मानवीय संवेदनाओं के पतन को इतनी गहराई से समझना और निभाना एक “बॉर्न एक्टर” (Born Actor) की निशानी है।
सामूहिक अभिनय की जीत: हर किरदार ने छोड़ी अपनी छाप
नाटक की सफलता केवल एक पात्र से नहीं, बल्कि पूरी टीम के तालमेल (Coordination) से तय होती है। जहाँ चैतन्य ने ‘घीसू’ बनकर नाटक को शिखर पर पहुँचाया, वहीं उनके साथी कलाकारों ने भी अपने अभिनय से इस इमारत को मजबूती दी। हर युवा कलाकार ने अपनी भूमिका के साथ पूरा न्याय किया:
- पृथ्वी वर्मा (माधव और श्रीकंठ): पृथ्वी ने दो अलग-अलग मिजाज के किरदारों को बड़ी कुशलता से निभाया। ‘कफन’ में माधव की लाचारी और ‘बड़े घर की बेटी’ में श्रीकंठ की गंभीरता—दोनों ही भूमिकाओं में उनकी रेंज (Range) काबिले-तारीफ थी।
- सायना खन्ना (भुंगी): ‘भुंगी’ के किरदार में सायना खन्ना ने दलित और शोषित स्त्री की पीड़ा को अपनी आँखों और भावों से बखूबी व्यक्त किया।
- प्राची सैन (गंगी): सामाजिक बंधनों को तोड़ने वाली साहसी ‘गंगी‘ के किरदार में प्राची सैन ने गजब का साहस और तेवर दिखाया। उनका अभिनय विद्रोह और स्वाभिमान का प्रतीक बनकर उभरा।
- अनन्या सिंह और कनिष्का शर्मा (आनंदी): ‘बड़े घर की बेटी’ की स्वाभिमानी ‘आनंदी‘ के किरदार को अनन्या और कनिष्का ने (डबल कास्ट में) जिस आत्मविश्वास और शालीनता के साथ मंच पर रखा, वह सराहनीय था।
- मान्या मल्होत्रा (बुधिया): ‘कफन’ की बुधिया, जिसका दर्द परदे के पीछे से भी महसूस होता है, उस मूक वेदना को मान्या मल्होत्रा ने बहुत ही संवेदनशीलता के साथ पेश किया।
- यशिका और वंशिका रानी (प्रेमा): कहानी ‘कायर’ की पात्र ‘प्रेमा‘ के अंतर्मन के द्वंद्व, प्रेम और त्याग को यशिका और वंशिका ने बहुत ही ग्रेसफुल (Graceful) तरीके से निभाया।
इन सभी कलाकारों ने मिलकर मंच पर जो ‘केमिस्ट्री’ बनाई, उसने मुंशी प्रेमचंद के 1930 के दौर को 2026 में दर्शकों के सामने जीवंत कर दिया। इन सभी कलाकारों की collective energy ने नाटक को केवल मंचन नहीं, एक जीवंत अनुभव बना दिया।
सहायक भूमिकाएं: जिन्होंने कहानी को ‘संपूर्ण‘ बनाया
किसी भी नाटक की सफलता सिर्फ मुख्य पात्रों पर निर्भर नहीं होती, बल्कि उन सहायक पात्रों पर भी होती है जो कहानी की दुनिया को ‘सजीव’ और ‘विश्वसनीय’ बनाते हैं। इस मामले में ‘प्रेमचंद की लड़कियां’ की पूरी टीम बधाई की पात्र है।
- वरिष्ठ और रोबदार चरित्र: अध्ययन दास (बेनीमाधव और लाला जी) और अनंत राज (बाबू महेशनाथ) ने पितृसत्तात्मक समाज के ठेकेदारों की भूमिका में अपनी आवाज और कद-काठी से गजब का प्रभाव छोड़ा। वहीं, साथी (कामता और लाल बिहारी) और आर्यण खेड़ा (केशव) ने अपने किरदारों को सहजता से निभाया।
- ग्रामीण परिवेश की जान: अमोघ जायसवाल (पंडित जी) और मोहम्मद हारिस (सिंह) ने अपने छोटे मगर महत्वपूर्ण रोल्स में दर्शकों का ध्यान खींचा। रागा गुप्ता (बूढ़ी अम्मा), आध्या सैनी (श्रीकंठ की माँ), सिमर चावला (प्रेमा की माँ) और कृति (ठकुराइन) ने स्त्री जीवन के अलग-अलग पहलुओं और पीढ़ियों के अंतर को बहुत ही खूबसूरती से मंच पर रखा।
- दृश्य और नृत्य: नाटक के दृश्यों को कलात्मक बनाने में यशिका, वंशिका, मान्या, अनन्या और कनिष्का के नृत्य ने चार चांद लगा दिए। गेस्ट आर्टिस्ट बानी सैकिया, उत्प्रेक्षा और ताश्वी तनेजा का सहयोग भी सराहनीय रहा।
इन सभी कलाकारों ने मिलकर यह साबित कर दिया कि रंगमंच पर कोई भी भूमिका छोटी नहीं होती; हर कलाकार कहानी का एक अनिवार्य हिस्सा होता है।
“प्रेमचंद की लड़कियां” मंच के पीछे के असली नायक: एक विश्वस्तरीय रचनात्मक टीम
इस भव्य प्रस्तुति को आकार देने में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) के उन दिग्गजों का हाथ रहा है, जिन्होंने न केवल रंगमंच बल्कि सिनेमा और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान बनाई है।
परिकल्पना और निर्देशन: जयंत राभा (Jayanta Rabha):
असम के उदलगुरी जिले में जन्मे जयंत राभा एक बहुआयामी प्रतिभा के धनी हैं। उन्होंने 2018 में एनएसडी से अभिनय में स्नातक किया और एफटीआईआई (FTII), पुणे से ‘फिल्म एंड टेलीविजन अप्रिसिएशन’ का कोर्स भी किया है ।
- अनुभव: जयंत 2018 से संस्कार रंग टोली के साथ जुड़े हैं। उन्होंने ‘ब्लैक रेन‘, ‘वेव‘ और शेक्सपियर के ‘मिडसमर नाइट्स ड्रीम’ पर आधारित ‘स्वप्न‘ जैसे नाटकों का निर्देशन किया है । उन्होंने ‘दुती मोन‘ (Duti Mon) नामक शॉर्ट फिल्म का निर्देशन भी किया है ।
- सामाजिक सरोकार: 2017 में उन्होंने “द कैनवास – अ फील्ड ऑफ क्रिएटिविटी” की स्थापना की, जिसके माध्यम से वे असम के आदिवासी बच्चों के साथ लगातार काम कर रहे हैं । इस नाटक में उनका उद्देश्य युवाओं को साहित्य के जरिए आज की सामाजिक सच्चाइयों, खासकर स्त्रियों की स्थिति से रूबरू कराना था ।
संगीत और गीत: देवेन्द्र अहिरवार (Devendra Ahirwar)
मध्य प्रदेश के छतरपुर से आने वाले देवेन्द्र अहिरवार ने इस नाटक को अपने संगीत से जादुई बना दिया। वे एनएसडी (2017) से डिज़ाइन और डायरेक्शन में ग्रेजुएट हैं ।
- बॉलीवुड और बैंड: देवेन्द्र मशहूर बैंड ‘मंडी हाउस द बैंड’ के संस्थापक हैं । हाल ही में उन्होंने फिल्म ‘120 Bahadur’ से बॉलीवुड में डेब्यू किया है, जो अमेज़न प्राइम (Amazon Prime) पर उपलब्ध है और जिसे दर्शकों का बेहद प्यार मिला है । इसके अलावा, वे जल्द ही अमेज़न प्राइम के शो ‘Band Wale’ में भी नजर आने वाले हैं । वे अपने म्यूजिकल शो ‘बहुत जोर से प्यार लगा है’ के लिए भी चर्चा में हैं ।
- लेखन: वे एक बेहतरीन कवि भी हैं और ‘पनडुब्बियाँ‘ (Pandubbiyaan) उनका पहला कविता संग्रह है ।
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अभिनय प्रशिक्षण और सेट डिज़ाइन: परमानंद (Paramanand)
दिल्ली के रहने वाले परमानंद एनएसडी (2015-18) के पूर्व छात्र हैं और उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से नुक्कड़ नाटकों के जरिए अपनी यात्रा शुरू की थी ।
- अंतर्राष्ट्रीय ख्याति: परमानंद लेखक, निर्देशक और अभिनेता हैं। उनके चर्चित नाटक ‘शादी के मंडप में’ (Shaadi Ke Mandap Mein) को मुंबई के टॉप-5 थिएटर शोज़ में जगह मिली और इसका मंचन रूस (Russia) और इटली (Italy) में भी किया गया ।
- तकनीकी दक्षता: वे ‘छऊ’ (Chhau) नृत्य और स्केचिंग में प्रशिक्षित हैं । सेट डिज़ाइनर के तौर पर उन्होंने ‘डांस ऑफ डाइस‘ और ‘यू शेप की गली‘ जैसे नाटकों में काम किया है । इस नाटक में उन्होंने न केवल 1930 के ग्रामीण भारत का जीवंत सेट तैयार किया, बल्कि बच्चों को अभिनय की बारीकियाँ भी सिखाईं ।
नेपथ्य के जादूगर: तकनीकी पक्ष जिन्होंने दृश्यों में प्राण फूँके
नाटक की सफलता में इसके तकनीकी पक्ष (Technical Aspects) का योगदान किसी भी मुख्य किरदार से कम नहीं था। इन कलाकारों ने पर्दे के पीछे रहकर नाटक को वह भव्यता और गहराई दी, जिसे दर्शक अपने साथ घर ले गए।
- गायन और वादन: संगीतकार देवेन्द्र अहिरवार की धुनों को कबीर खान, खुशी खान, ज़ारा खान और पूजा वेदविख्यात की रूहानी आवाज़ों ने जीवंत बना दिया । इन गायकों ने लाइव सिंगिंग से जो समां बांधा, उसने दर्शकों को भावुक कर दिया। वाद्य यंत्रों पर कबीर खान और नरेन्दर कुमार की संगत बेमिसाल थी ।
- वेशभूषा (Costume): सुप्रसिद्ध संस्कृतिकर्मी सावित्री मिश्रा द्वारा डिज़ाइन की गई वेशभूषा ने पात्रों के सामाजिक परिवेश को पूरी प्रमाणिकता (Authenticity) के साथ प्रदर्शित किया । धोती, कुर्ते और साड़ियों के रंग और बनावट ने दर्शकों को सीधे 1930 के प्रेमचंद युगीन भारत में पहुँचा दिया।
- दृश्य भाषा (Visual Language): राकेश कुमार की कोरियोग्राफी ने नाटक की गति (Pace) को बनाए रखा , वहीं सारस कुमार की लाइट डिज़ाइन (Light Design) ने दृश्यों के मूड को गहरा किया । रौशनी और अंधेरे का खेल पात्रों के आंतरिक द्वंद्व को बखूबी उभार रहा था।
संस्कार रंग टोली (NSD TIE Company): बाल रंगमंच की रीढ़

16 अक्टूबर 1989 को स्थापित , राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD)की संस्कार रंग टोली देश के प्रमुख शैक्षिक संसाधन केंद्रों में से एक है । यह कंपनी ‘जश्नेबचपन’ (Jashnebachpan) और ‘बाल संगम’ (Bal Sangam) जैसे प्रतिष्ठित समारोहों के माध्यम से बच्चों के मानसिक और सामाजिक विकास में रंगमंच की भूमिका को सशक्त कर रही है। आज के युवा कलाकारों को ऐसे प्रतिष्ठित मंच (NSD TIE Company) पर काम करने का अवसर मिलना उन सभी बाल कलाकारों के उज्ज्वल भविष्य की नींव है।।
निर्देशक जयंत राभा की मेहनत ने इस शाम को यादगार बना दिया। नाटक – “Premchand ki Ladkiyan” के अंत में दर्शकों की तालियाँ सिर्फ प्रशंसा नहीं थीं—वो सम्मान था, जो इन युवा कलाकारों ने मंच पर दिखाया। ‘कलरव’ फेस्टिवल (Kalrav Festival) में मंचित ‘प्रेमचंद की लड़कियां’ सिर्फ एक नाटक (Hindi theatre) नहीं, बल्कि युवा ऊर्जा और क्लासिक साहित्य का एक बेहतरीन दस्तावेज है। NSD TIE Company की यह प्रस्तुति मंडी हाउस के रंगमंच माहौल में दर्शकों के लिए बेहद यादगार रही।


